शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

जी चाहता है !

जी चाहता है ,
अब निकल ही जाऊँ ,
उस यात्रा पर ,
जिसकी मंजिल
यात्रा ही है !
आखिर कभी तो ,
मुझे चलना ही है ,
उस यात्रा पर जिसकी तलाश में ,
मैं कई जन्मों से हूँ !
भटकते हुए जाने कहाँ - कहाँ ,
कहाँ आ गया हूँ मैं ?
फिर से वही रिश्तों के बंधन में ,
क्यूँ बंध गया हूँ मैं ?
क्यूँ बार -बार ख़ुद ही
ख़ुद को बाँध लेता हूँ मैं !
तड़पता हूँ फ़िर क्यूँ ,
अपने ही बनाये जाल में ,
क्यूँ नही समय रहते ,
इससे निकल पाता हूँ मैं !
जी चाहता है अब ,
निकल ही जाऊँ ,
उस यात्रा पर ,
जिसकी मंजिल
यात्रा ही है !

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