बुधवार, 25 फ़रवरी 2009

अब तो आजा !

जी चाहता है यूँ ही लिखता रहूँ और जिंदगी गुजर जाए ,
जब तक कि तेरी यादों के साथ तू न आए !
काश कि मेरे दिल कि तड़प से तेरी पहचान हो जाए ,
वरना मेरी जिंदगी यूँ ही तमाम हो जाए !
मैं यूँ ही मरता रहा हूँ और मरता रहूँगा ,मरे बगैर ,
अब तो आजा , मुझे मुक्ति नहीं मिलेगी तेरे बगैर !

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