कब सजेगी अर्थी मेरी ,
कब मिलकर सब , मुझे फूंक आयेंगे !
जिंदगी तू तो है , एक पौधे की तरह ,
पर इस पर , मौत के फूल कब आयेंगे !
जानता हूँ , दर्द होगा मेरे प्यारों को ,
पर चार दिन में , सब भूल जायेंगे !
कब सजेगी अर्थी मेरी ,
कब मिलकर सब , मुझे फूंक आयेंगे !
जाना चाहता हूँ , ये वादा कर के ,
कि लौट के हम , फ़िर आयेंगे !
वो बचपन की मस्ती ,वो जवानी का जोश ,
वो खूबसूरत दिन ,फ़िर लौट आयेंगे !
कब सजेगी अर्थी मेरी ,
कब मिलकर सब , मुझे फूंक आयेंगे !
प्रवीण " अकेला "
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