शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2009

मेरी अर्थी !

कब सजेगी अर्थी मेरी ,
कब मिलकर सब , मुझे फूंक आयेंगे !

जिंदगी तू तो है , एक पौधे की तरह ,
पर इस पर , मौत के फूल कब आयेंगे !

जानता हूँ , दर्द होगा मेरे प्यारों को ,
पर चार दिन में , सब भूल जायेंगे !

कब सजेगी अर्थी मेरी ,
कब मिलकर सब , मुझे फूंक आयेंगे !

जाना चाहता हूँ , ये वादा कर के ,
कि लौट के हम , फ़िर आयेंगे !

वो बचपन की मस्ती ,वो जवानी का जोश ,
वो खूबसूरत दिन ,फ़िर लौट आयेंगे !

कब सजेगी अर्थी मेरी ,
कब मिलकर सब , मुझे फूंक आयेंगे !


प्रवीण " अकेला "

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